Bengal Politics 2026(पत्रकार दया शंकर सिंह) : पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझना हो, तो एक बात साफ है, यहाँ सत्ता का रास्ता मुस्लिम बहुल इलाकों से होकर गुजरता है। राज्य में मुसलमानों की आबादी करीब 27 फीसदी है, और इस वोट बैंक पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पकड़ पिछले डेढ़ दशक में इतनी मजबूत हो गई है कि अब यह ममता बनर्जी की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी मानी जाती है।
2026 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, ममता का यह ‘M-फैक्टर’ यानी मुस्लिम फैक्टर एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। खुद ममता बनर्जी ने हाल ही में एक सभा में कहा “हम हैं, इसीलिए आप सब सुरक्षित हैं। अगर हम न रहे, तो एक सेकंड लगेगा 12 बजाने में। इस बयान की जितनी आलोचना हुई, उतनी ही ममता की समर्थकों में तालियाँ भी बजीं।
Bengal Politics 2026: 2011 से कैसे शुरू हुआ यह सफर?
2011 से पहले बंगाल का मुस्लिम वोटर मुख्य रूप से लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ था। ममता ने इस समीकरण को बदला और बड़ी चालाकी से।
उन्होंने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को हथियार बनाया और बार-बार कहा कि 34 साल के वामपंथी शासन में मुसलमानों की हालत दलितों से भी खराब हो गई है। इसके बाद सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन आए, जिनमें विस्थापित होने वाले किसानों में बड़ी तादाद मुस्लिमों की थी। ममता उनके साथ खड़ी हुईं और खुद को उनका ‘रक्षक’ साबित किया।
नतीजा यह रहा कि कांग्रेस और लेफ्ट का कैडर धीरे-धीरे TMC की तरफ खिसक गया, और एक बार जो भरोसा बना, वह हर चुनाव में और गहरा होता गया।
*योजनाएं, इफ्तार और इनवेस्टमेंट: दीदी की तीन ताकत
*ममता बनर्जी ने सिर्फ भाषण नहीं दिए। उन्होंने जमीनी स्तर पर ऐसे काम किए जिनका सीधा असर मुस्लिम समाज पर पड़ा।










