रांची(पत्रकार दया शंकर सिंह): झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में ग्राम पंचायत स्तर पर बिना पंजीकृत फार्मासिस्ट के संचालित हो रही दवा दुकानों के मामले को गंभीरता से लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। यह मामला W.P.(C) No. 220 of 2026 के तहत मानस मुखर्जी एवं अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिना योग्य फार्मासिस्ट के फार्मेसी संचालन किया जा रहा है जो फार्मेसी अधिनियम 1948 का स्पष्ट उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि इस प्रकार की व्यवस्था से न केवल कानून का उल्लंघन हो रहा है बल्कि आम लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने पाया कि पूर्व में दायर किए गए कुछ हलफनामों में याचिका में उठाए गए गंभीर मुद्दों का संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल औपचारिक जवाब देना पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने झारखंड सरकार के स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया है कि वे स्वयं विस्तृत हलफनामा दाखिल कर सभी बिंदुओं पर स्पष्ट जवाब दें। साथ ही फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया, ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया और अन्य संबंधित पक्षों को भी अपने-अपने पक्ष स्पष्ट करने के लिए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने सख्त समयसीमा तय करते हुए सभी प्रतिवादियों को 17 अप्रैल 2026 तक अपना काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का आदेश दिया है। वहीं याचिकाकर्ताओं को 30 अप्रैल तक प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 7 मई 2026 को निर्धारित की गई है जहां कोर्ट इस याचिका को अंतिम रूप से निपटाने का प्रयास करेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व में यह देखा गया है कि प्रधान सचिव स्तर के अधिकारी स्वयं हलफनामा दाखिल करने से बचते हैं और यह जिम्मेदारी अन्य अधिकारियों को सौंप दी जाती है। इस पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले में प्रधान सचिव को स्वयं जवाब देना होगा। इस मामले को लेकर जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि याचिका में राज्य के कई प्रमुख विभागों और अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया है जिनमें स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव, फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया के रजिस्ट्रार, ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया, झारखंड ड्रग कंट्रोलर, पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त और सिविल सर्जन शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला राज्य में दवा वितरण व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से सीधे जुड़ा हुआ है। यदि अदालत इस पर सख्त निर्णय देती है तो ग्रामीण क्षेत्रों में दवा दुकानों के संचालन के नियमों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल पूरे मामले पर सभी की नजरें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं जहां यह तय होगा कि राज्य में फार्मेसी संचालन के नियमों को लेकर क्या दिशा तय की जाती है
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